जानिए ! कैसे दिन फिरते ही हुमायूं ने ईरान के शाह से की गद्दारी

0
191

एक साल तक पर्शिया के शाह की मेहमाननवाजी में वक़्त गुजारने के बाद हुमायूं 1545 में कंधार के लिए रवाना हुआ. उसके साथ शाह के 500 घुड़सवार और12000 पैदल सैनिक थे. वादे के मुताबिक़ हुमायूं को महीने भर के भीतर अपने भाई कामरान से कंधार छीन कर शाह को सौंपना था. कंधार एक ऐसा प्रदेश था जो पर्शिया के शाह और मुगलों के लिए आन का सवाल था. कंधार के लिए हुमायूं के बाद भी ईरानी शाह और मुगलों के बीच जबरदस्त लड़ाइयां हुई। कभी कोई जीतता तो कभी कोई। आखिरकार शाहजहां के समय में शाह ने कंधार को हमेशा के लिए मुगलों से छीन लिया। बहरहाल…..

चार महीने के संघर्ष के बाद हुमायूं ने कंधार पर जीत हासिल कर ली. वादे के मुताबिक़ हुमायूं ने कंधार पर्शियन कमांडर को तो सौंप दिया लेकिन उसके दिल में कसक बनी रही। इस अभियान में शाह का नाबालिग बेटा भी उसके साथ था। जल्द ही उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मौत के बाद हुमायूं ने कंधार को हासिल करने के लिए एक चाल चली. उसने पर्शियन कमांडर पर संगीन इलज़ाम लगाते हुए उसे बर्खास्त कर दिया और किला अपने कब्जे में कर लिया। उसने शाह को सन्देश भेजा की वो कंधार में शाह के गवर्नर की हैसियत से मौजूद रहेगा और भयानक ठण्ड के कारण यहाँ रहकर काबुल मुहीम की तैयारी करेगा। हुमायूं की किस्मत अच्छी थी की शाह ने उसकी बातों पर भरोसा कर लिया।

इसी समय हुमायूं की किस्मत ने भी उसका साथ दिया। उसके दो भाई कामरान का साथ छोड़ उससे आ मिले। साथ ही कामरान के सैनिक भी भारी संख्या में हुमायूं की सेना में भर्ती हो गए। इस तरह हुमायूं का पक्ष काफी मजबूत हो गया। अब उसे शाह के सैनिकों की कोई जरूरत नहीं थी फिर भी उसने शाह को भुलावे में बनाए रखा और अपने भाई अस्करी को कंधार सौंप कर काबुल मुहीम के लिए निकल पडा.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here