औरंगजेब की वफादारी की कीमत मिर्ज़ा राजा जय सिंह को जान देकर चुकानी पड़ी

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मिर्ज़ा राजा जयसिंह’ अथवा ‘जयसिंह प्रथम’ आमेर के राजा तथा मुग़ल साम्राज्य के वरिष्ठ सेनापति थे. शाहजहाँ ने अप्रॅल, 1639 ई. में जयसिंह को रावलपिण्डी बुलाकर ‘मिर्ज़ा राजा‘ की पदवी दी थी। यह पदवी उनके दादा मानसिंह को भी अकबर से मिली थी।

जयसिंह मुग़ल दरबार का सर्वाधिक प्रभावशाली सामंत था। बादशाह औरंगज़ेब के लिए वह सबसे बड़ा आँख का काँटा था।दरअसल मिर्जा राजा ने उत्तराधिकार की लड़ाई शाहजहाँ के चहेते बेटे दारा का साथ दिया था. जब औरंगजेब बादशाह बना तो जय सिंह से नाराज होते हुए भी उन्हें दरबार में ऊँची पदवी दी. राजा जय सिंह का राजपूतों पर काफी असर था. इसलिए औरंगजेब राजा जय सिंह से वैर मोल लेकर राजपूतों को नाराज नहीं करना चाहता था. शिवाजी महाराज के साथ युद्ध में जब अफ़ज़ल ख़ाँ एवं शाइस्ता ख़ाँ की हार हुई तब औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जयसिंह को शिवाजी महाराज को दबाने के लिए भेजा। इस प्रकार वह एक तीर से दो शिकार करना चाहता था।जयसिंह खुद को राम का वंशज मानता था। उसने युद्ध में जीत हासिल करने के लिए एक सहस्त्र चंडी यज्ञ भी कराया। शिवाजी को इसकी खबर मिल गयी थी जब उन्हें पता चला की औरंगजेब हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाना चाहता है। जिस से दोनों तरफ से हिन्दू ही मरेंगे। तब शिवाजी ने जयसिंह को समझाने के लिए पत्र लिखा.
जयसिंह ने बड़ी बुद्धिमत्ता, वीरता और कूटनीति से शिवाजी को औरंगजेब से संधि करने के लिए राजी किया।

उसने बादशाह की इच्छानुसार शिवाजी को आगरा दरबार में उपस्थित होने के लिए भी भेज दिया, किंतु वहाँ महाराज के साथ बड़ा अनुचित व्यवहार हुआ और औरंगजेब की आज्ञा से उन्हें नज़रबंद कर दिया गया।बाद में शिवाजी किसी प्रकार औरंगज़ेब के चंगुल में से निकल गये, जिससे औरंगज़ेब बड़ा दु:खी हुआ। उसने उन सभी लोगों को कड़ा दंड दिया, जिनकी असावधानी से शिवाजी को निकल भागने का अवसर मिल गया था।
मिर्ज़ा राजा जयसिंह और उसका पुत्र कुँवर रामसिंह भी उसके लिए दोषी समझे गये, क्योंकि वे ही शिवाजी की आगरा में सुरक्षा के लिए अधिक चिंतित थे।औरंगज़ेब ने रामसिंह का मनसब और जागीर छीन ली तथा जयसिंह को तत्काल दरबार में उपस्थित होने का हुक्मनामा भेजा। जयसिंह को इस बात का बड़ा खेद था कि शिवाजी को आगरा भेजने में उसने जिस कूटनीतिज्ञता और सूझ-बूझ का परिचय दिया था, उसके बदले में उसे वृद्धावस्था में अपमान एवं लांछन सहना पड़ा। इस दु:ख में वह अपनी यात्रा भी पूरी नहीं कर सका और मार्ग में बुरहानपुर में 1667 में उसकी मृत्यु हो गई।

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