Prataprao Gujar(part -1):जब इस मराठा योद्धा ने शिवाजी महाराज को ललकारा

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तापराव गूजर छत्रपति शिवाजी महाराव की सेना के एक योग्य,वीर, साहसी और चतुर, सेनानायक थे. प्रताप राव ने अपने सैनिक जीवन का प्रारम्भ शिवाजी की फौज में एक मामूली गुप्तचर के रूप में किया था। एक बार शिवाजी वेश बदल कर सीमा पार करने लगेतो प्रताप राव ने उन्हें ललकार कर रोक लियाशिवाजी ने उसकी परीक्षा लेने के लिए भांति-भांति के प्रलोभन दियेपरन्तु प्रताप राव टस से मस नहीं हुआ। शिवाजी प्रताप राव की ईमानदारीऔर कर्तव्य परायणता से बेहद प्रसन्न हुए। अपने गुणों और शौर्य सेवाओं के फलस्वरूप सफलता की सीढ़ी चढ़ता गया शीघ्र ही राजगढ़ छावनी का सूबेदार बन गया।  

औरंगजेब ने जुलाई 1659 में शाइस्तां खां को आदेश दिया कि वह मराठों से उन क्षेत्रों को छीन ले जो उन्होंने बीजापुर से जीते हैं.शायस्ता खान इसमें काफी हद तक सफल भी हुआ.

 शिवाजी महाराज ने  प्रताप राव को अपने प्रदेश वापस जीतने की आज्ञा दी.प्रताप राव गूजर ने मुगल क्षेत्रों में एक सफल अभियान किया। वह अपनी घुड़सवार सेना के साथ मुगलों के अन्दरूनी क्षेत्रों में घुस गया और दख्खन में मुगलों की राजधानी औरंगाबाद पर चढ़ आया। प्रताप राव ने मुगल सेनापति को युद्ध में हराकर उसका वध कर दिया। इस सैनिक अभियान से प्राप्त बेशुमार धन-दौलत लेकर प्रताप राव वापस घर लौट आयाप्रताप राव के इस सैन्य अभियान से शाइस्ता खां की मुहिम को एक बड़ा धक्का लगा। इस जीत से उत्साहित शिवाजी महाराज ने सीधे शायस्ता खान पर हमला बोल दिया। लेकिन तीन उंगलियां गंवाने के बावजूद मुगलों ने सिंहगढ़ में मोर्चा जमा लिया।  सिंहगढ़ की लड़ाई में प्रताप राव गूजर ने जिस बहादुरी और रणकौशल का परिचय दिया, शिवाजी उससे बहुत प्रसन्न हुए। 

शायस्ता खान की नाकामी के बाद औरंगज़ेब ने मिर्ज़ा राजा जय सिंह को विशाल सेना के साथ शिवाजी महाराज को सबक सिखाने भेजा। शिवाजी युद्ध की स्थिति का जायजा लेकरइस नतीजे पर पहुंचे कि जय सिंह को आमने-सामने की लड़ाई में हराना सम्भव नहीं है। अत: उन्होंने प्रताप राव गूजर को जय सिंह का वध करने का कार्य सौंपा। एक योजना के अन्तर्गत प्रताप राव जय सिंह के साथ मिल गये और एक रात मौका पाकर उन्होंने जय सिंह को उसके शिविर में मारने का एक जोरदार प्रयास किया परन्तु अंगरक्षकों के चौकन्ना होने के कारण जय सिंह बच गया। प्रताप राव गूजर शत्रुओं के हाथ नहीं पड़ा और वह शत्रु शिविर से जान बचाकर निकलने में सफल रहा।

1672 के अन्त में  अपने दक्षिणी क्षेत्रों की रक्षा की दृष्टि से मराठों ने पन्हाला को बीजापुर से छीन लिया। सुल्तान ने पन्हाला वापिस पाने के लिये बहलोल खान उर्फ अब्दुल करीम के नेतृत्व में एक शक्तिशाली सेना भेजी। प्रताप राव गूजर ने पन्हाला को मुक्त कराने के लिये एक अद्भुत युक्ति से काम लिया। प्रताप राव गूजर ने पन्हाला कूच करने के स्थान पर आदिलशाही राजधानी बीजापुर पर जोरदार हमला बोल दिया और उसके आसपास के क्षेत्रों को बुरी तरह उजाड़ दिया। उस समय बीजापुर की रक्षा के लिए वहां कोई सेना नहीं थी अत: बहलोल खान पन्हाला का घेरा उठाकर बीजापुर की रक्षा के लिए भागा। लेकिन प्रताप राव ने उसे बीच रास्ते में उमरानी के समीप जा घेरा।

 बहलोल खान की सेना की रसद रोक कर प्रताप राव ने उसे अपने जाल में फंसा लिया और उसकी बहुत सी अग्रिम सैन्य टुकड़ियों का पूरी तरह सफाया कर दिया। बहलोल खान ने हार मानकर शरण मांगी। प्रताप राव ने संधि की आसान शर्तो पर उसे जाने दिया। लेकिन जैसे ही प्रतापराव बरार पर आक्रमण करने के लिये दूर निकले बहलोल खान पुन: अपनी सेना को संगठित कर पन्हाला की तरफ चल दिया। प्रताप राव खबर मिलते ही वापस लौटा और नैसरी के पास दोनों का आमना-सामना हो गया। प्रताप राव के पास मात्र 1200 सैनिक थे जबकि बहलोल खान की सेना में 15000सैनिक थे। स्थिति को भांपते हुए शेष मराठा सेना खामोश रहीपरन्तु अहसान फरामोश और कायर बहलोल खान को देखकर प्रताप राव अपने आवेग पर काबू न रख सका और वह बहलोल खान पर टूट पड़ा। मात्र सैनिकों ने प्रताप राव का अनुसरण कियावे बहुत साहस और वीरता से लड़े परन्तु शत्रु की विशाल सेना के मुकाबले लड़ते हुए  वीरगति को प्राप्त हो गये।

प्रताप राव की मृत्यु का सबसे अधिक दु:ख शिवाजी महाराज  को हुआ। शिवाजी ने महसूस किया कि उन्होंने अपने बहादुर और विवसनीय सेनापति को खो दिया। प्रताप राव के परिवार से सदा के लिये नाता बनाए रखने के लिए उन्होंने अपने पुत्र राजाराम का विवाह उसकी पुत्री के साथ कर दिया।   

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