चीनी कमांडर ने जसवंत सिंह की बहादुरी को ऐसे किया सलाम

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अपने तीसरे हमले में अरुणांचल प्रदेश के तवांग नामक स्थान से महात्मा बुद्ध की मूर्ति के हाथो को काटकर ले जाने वाले चीनी सैनिको ने जब 17 नवम्बर 1962 को अरुणांचल प्रदेश पर कब्ज़ा करने के लिए अपना चौथा और आखिरी हमला किया तो उस वक़्त वहाँ भारतीय सेना ना तो युद्ध के लिए तैयार थी न कोई रणनीति थी और न ही ज्यादा जवान थे और न ही उनके पास कोई युद्ध करने की कोई मशीने,गाडीया,और अन्य यंत्र सिर्फ एक रायफल थी ।और इसका कारण थे सिर्फ उस वक़्त के रक्षा मंत्री v.k कृष्णमेनन ।जिन्होंने उस दौरान हमारी सेना को बहुत कमजोर और हारने पर मजबूर कर दिया था,दरअसल V.K कृष्णमेनन उस वक़्त के एक ऐसे गृह मंत्री थे जिन्होंने फ़ौज की नफरी (strength) कम कर दी और गोला बारुत बनने वाली फक्ट्रियो को बंद करवा दिया। कारण ये था की जवाहर लाल नेहरु चीन से एक नारा लेकर आए थे कि “हिन्दी चीनी भाई भाई “।उस वक़्त पकिस्तान के साथ भी हमारा समझौता हो चुका था और ऐसे में मेनन को लगा की अब तो भारत पर हमला करने वाला कोई नहीं है तो फिर फ़ौज पर पैसा खर्च करके क्या फायदा ।फिर गोला बारूद बनाने वाली फक्ट्रिया बर्तन बनाने लग गयी और जब यह बात चीन को पता चली तो उसने भारत पर हमला करने की सोची और अरुणांचल    प्रदेश से कब्ज़ा करना शुरू कर दिया क्योंकि अरुणांचल प्रदेश की सीमा पर जवानों की तैनाती नहीं थी ,इसलिए चीन की सेना ने इसका फायदा उठाया और भारत पर हमला बोल दिया।उस वक़्त चीन की सेना ने यहाँ बहुत तबाही मचाई वे महात्मा बुद्ध की मूर्ति के हाथो को काटकर ले गए माँ बहनों की इज्जत लूटने लग गये,अब हालत जब काबू से बाहर हो गये तो यहाँ से गढ़वाल रायफल की 4th बटालियन को वहाँ भेजा दिया गया।और गढ़वाल रायफल की इसी बटालियन के एक वीर साहसी जवान थे जसवंत सिंह रावत ।इस हार का मुख्य कारण रहे रक्षा मंत्री v.k मेनन की वजह न तो उस वक़्त हमारे पास फ़ौज थी न हथियार और न ही कोई ठोस रणनीति ,दूसरी तरफ से चीन अपनी पूरी ताकत के साथ जोरो से हमला करता जा रहा था हर मोर्चे पर चीनी सैनिक हावी होते जा रहे थे ।और इस कारण भारत ने अपनी हार को स्वीकार करते हुए नुरानांग पोस्ट पर डटी गढ़वाल रायफल की 4th बटालियन को भी वापस बुलाने का आदेश दे दिया । आदेश का पालन कर पूरी बटालियन वापस लौट गयी लेकिन जसवंत सिंह ने वापस लौटने से इनकार कर दिया .

आदेश मिलने के बावजूद जसवंत सिंह ने वापस लौटने से इनकार कर दिया और मोर्चे पर डेट रहे. अब पोस्ट पर  गढ़वाल रायफल के सिर्फ 3 जवान   रायफल मैन जसवंत सिंह रावत,लांस नाइक त्रिलोक सिंह नेगी, रायफल मैन गोपाल सिंह गुसाईं थे. इस वक़्त जसवंत सिंह रावत ने एक कड़ा और अदम्या फैसला लिया की कुछ भी हो जाये वो वापस नहीं जायेंगे और उन्होंने lance naik त्रिलोक सिंह नेगी और रायफल मैन गोपाल सिंह गुसाईं को वापस भेज दिया और खुद नूरानांग की पोस्ट पर तैनात होकर दुश्मनों को आगे न बढ़ने देने का फैसला किया,जसवंत सिंह रावत ने अकेले ही 72 घंटो तक चीन के 300 दुश्मनों को मौत के घाट उतारा और किसी को भी आगे नहीं बढ़ने दिया ,यह उनकी सूझबूझ के कारण ही संभव हो सका।क्यूंकि उन्होंने पोस्ट की अलग अलग जगहों पर रायफल तैनात कर दी थी और कुछ इस तरह से फायरिंग कर रहे थे की चीन की सेना को लग रहा था की यहाँ पूरी की पूरी बटालियन मौजूद हैं।इस बीच रावत के लिए खाने पीने का सामान और उनकी रसद (supply) आपूर्ति वहाँ की दो बहनों शैला और नूरा ने की जिनकी शहादत को भी कम नहीं आँका जा सकता। 72 घंटे तक चीन की सेना ये नहीं समझ पाई की उनके साथ लड़ने वाला एक अकेला सैनिक है । फिर 3 दिन के बाद जब नूरा को चीनी सैनिको ने पकड़ दिया तो उन्होंने इधर से रसद (supply) आपूर्ति करने वाली शैला पर ग्रेनेड से हमला किया और वीरांगना शैला शहीद हो गयी और उसके बाद उन्होंने नूरा को भी मार दिया दिया और इनकी इतनी बड़ी शहादत को हमेशा के लिए जिंदा रखने के लिए आज भी नूरनाग में भारत की अंतिम सीमा पर दो पहाड़िया है जिनको नूरा और शैला के नाम से जाना जाता है,इसके बावजूद भी जसवंत सिंह रावत दुश्मनों से लड़ते रहे पर रसद आपूर्ति (supply) की कड़ी कमजोर पड गयी थी और फिर जसवंत सिंह ने 17 नवम्बर 1962 को खुद को गोली मार कर अपने प्राण न्योछावर कर दिए और भारत माँ की गोद में हमेशा के लिए अमर हो गए,क्या किया फिर चीनी सैनिको ने-

फिर जब चीनी सैनिको ने देखा की वो 3 दिन से एक ही सिपाही के साथ लड़ रहे थे तो वो भी हैरान रह गए । वो जसवंत सिंह रावत का सर काटकर अपने देश ले गए। 20 नवम्बर 1962 को युद्ध विराम की घोषणा कर दी गयी और चीनी कमांडर ने जसवंत सिंह की इस साहसिक बहादुरी को देखते हुए न सिर्फ जसवंत सिंह का शीश वापस लौटाया बल्कि सम्मान स्वरुप एक कांस की बनी हुई जसवंत सिंह की मूर्ति भी भेंट की 

 
  

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