राव तुला राम :स्वाधीनता संग्राम का एक गुमनाम योद्धा

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1857 की क्रांति में अपने कौशल दिखा चुके तुलाराम का दूसरा रूप 1959 के आस-पास नजर आता है जब लगभग 34-35 बरस के तुलाराम, एक बड़ी मुहिम के लिए खुद को आगे करते हैं. रियासतों के स्व-घोषित शासकों के एक समूह ने तय किया कि रूसी जार के पास उनमें से कोई दूत बनकर जाए और मदद की दरख्वास्त करे. तुलाराम ने इस दुर्गम और तकलीफदेह यात्रा के लिए खुद को पेश किया और मारवाड़, बीकानेर और जयपुर के जार के नाम लिखे गए अलग-अलग पत्रों के साथ , एक दस्ते समेत, रूस का रुख किया.अपने इस मिशन में पहले वह इरान गए या रूस इस पर भी संशय है लेकिन जब वह काबुल पहुंचे तो उनका गिरता स्वास्थ्य गंभीर स्थितियों में पहुंच गया था और 23 सितंबर 1862 या 63 में काबुल में उनकी मृत्यु हो गई.हरियाणा में अहीर समुदाय के लिए एक कहावत बड़ी मशहूर थी- ‘यूं आकर कही अज़ीम ने सुनो भई बस्ती गांव, बचना मर्द अहीर से वर्ना लड़कर कर लो नाम’.

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