मुहम्मद राणे खान:जानिए ! कैसे एक मुस्लिम शख्स ने महादजी सिंधिया को दिया जीवन दान

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पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठों को अपार धन-जन की क्षति उठानी पडी .लेकिन इस लड़ाई में महादजी सिंधिया एक मुस्लिम मुहम्मद राणे खान की मदद से बच गए . राने खान पानी ढोने वाले अपने बैल पर, चमड़े की मशकों के बीच उन्हें बांध कर बचा लाया था । महादजी ने राणे खान के उपकार को आजीवन नहीं भुलाया | राणे खान के वंशज अभी भी सिंधिया घराने में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।हालांकि राने खान का कोई सैनिक पृष्ठभूमि नहीं थी लेकिन महादजी की सोहबत में एक कुशल योद्धा साबित हुए और मराठों के लिए कई बड़े अभियान को अंजाम दिया. उन्हीं में से एक था मुग़ल सम्राट शाहआलम द्वितीय को पुनः गद्दी पर बिठाना .

जुलाई 1788 में गुलाम कादिर रोहेला ने दिल्ली पर कब्जा किया और अगस्त में शाहआलम द्वितीय को अंधा कर दिया। मुग़ल शाहजादों और हरम की महिलाओं को यातनाएँ दीं और छुपे खजाने का पता लगाने के लिए सम्राट की बेइज्जती की.उसने अपने खंजर से वृद्ध सम्राट की आँखें निकालकर उसे अन्धा कर दिया उसका तथा उसकी औरतों का अपमान किया और सारा का सारा धन पाने के लिए शाही भण्डार को खुदवा डाला। भारत के इतिहास में मुगल परिवार को जैसी कठिनाई और विपत्ति इस रुहेले गुण्डे अत्याचारी के हाथों सहनी पड़ी, वैसी पहले कभी नहीं सहनी पड़ी । अन्धे सम्राट ने महादजी सिन्धिया से दिल्ली आकर गुलाम कादिर को उचित दण्ड देने की दर्द भरी अपील की।सितंबर में महादजी को कुछ अस्पष्ट समाचार प्राप्त हुए तो उन्होंने सहायता के लिए तुरंत एक अभियान संगठित किया। उन्होंने एक बड़ी शक्ति के साथ राणे खाँ को भेजा।

राने खान के नेतृत्व में मराठों ने 28 सितंबर को पुरानी दिल्ली तथा 2 अक्टूबर को मुख्य नगर पर अधिकार कर लिया। इस्माइल बेग तथा बेगम समरू ने राणे खाँ का साथ दिया और किले पर तोपों की मार आरंभ कर दी। पराजय के डर से गुलाम कादिर लूट का माल यमुनापार भेजने लगा ताकि वह उसके धौसगढ़ स्थित घर में सुरक्षित रखा जा सके। 10 अक्टूबर को रुहेले सिपाहियों की लापरवाही से किले के बारूद खाने में विस्फोट हो गया। इसके बाद शेष सिपाहियों तथा लूट के माल को लेकर गुलाम कादिर ने लालकिले को खाली कर दिया। अगले दिन 11 अक्टूबर को राने खाँ, हिम्मत बहादुर गोसाईं तथा रानाजी शिंदे ने गढ़ में प्रवेश किया। उन्होंने भूखे निवासियों को भोजन दिया तथा महल में रहने वालों के लिए यथाशक्ति शांति तथा सुविधा पहुँचाने का प्रयत्न किया। 16 अक्टूबर को राणे खाँ ने का अंधे सम्राट के सम्मुख उपस्थित होकर उनको राजगद्दी पर बिठा दिया और उनके नाम से पुनः खुतबा पढ़वाया

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