पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट : जब पेशवा ने मुगलिया सल्तनत को तीन दिनों तक बंधक बना कर रखा

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हिन्दुस्तान के इतिहास के बाजीराव अकेला ऐसा योद्धा था जिसने 41 लड़ाइयां लड़ीं और एक भी नहीं हारीं। बाजीराव बिजली की गति से तेज आक्रमण करते थे और यही उनकी जीत की वजह थी. बाजीराव ने अपना प्रधानमंत्री का पद सन् 1720 से अपनी मृत्यु तक संभाला। उनको बाजीराव बल्लाल भट्ट और थोरल बाजीराव के नाम से भी जाना जाता है।बाजीराव दिल्ली से मुगलों को खदेड़ कर पूरे देश को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे .बाजीराव ने मुगलों को अपनी ताकत का एहसास करवाया जरूर लेकिन वो दिल्ली पर कब्जा करने के बजाय वापस पुणे लौट गए .उनकी यही भूल भारत के भविष्य के लिए अभिशाप बन गयी .

बाजीराव के पद पर आने के बाद मुगल सम्राट मुहम्मद शाह ने शिवाजी महाराज द्वारा जीते गए प्रदेशों पर मराठों का अधिकार मानने से इंकार कर दिया .बाजीराव ने मुगलों का सबक सिखाने का निश्चय किया. उस वक्त देश में कोई भी ऐसी ताकत नहीं थी, जो सीधे दिल्ली पर आक्रमण करने का ख्वाब भी दिल में ला सके।लेकिन बाजीराव ने ये वीडा उठाया . उन्होंने 12 नवंबर 1736 को पुणे से दिल्ली मार्च शुरू किया। 10 दिन की दूरी बाजीराव ने केवल 500 घोड़ों के साथ 48 घंटे में पूरी कर ली. उनकी रणनीति के कारण सारी मुगल सेना आगरा-मथुरा में अटक गई और बाजीराव दिल्ली तक चढ़ आया.बाजीराव ने 3 दिन तक दिल्ली को बंधक बनाकर रखा था। मुगल बादशाह की लाल किले से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं हुई। यहां तक कि 12वां मुगल बादशाह और औरंगजेब का नाती दिल्ली से बाहर भागने ही वाला था कि बाजीराव मुगलों को अपनी ताकत दिखाकर वापस लौट गए।

बाजीराव के लिए लाल किले में घुसकर दिल्ली पर कब्जा कर लेना आसान था । लेकिन बाजीराव की जान तो , महाराष्ट्र में बसती थी। 3 दिन तक दिल्ली में डेरा डालने के बाद बाजीराव वापस लौट गए .
बाजीराव पेशवा की मृत्यु 28 अप्रैल 1740 को 39 वर्ष की आयु में दिल का दौरा पड़ने से हुई थी। बाजीराव का केवल 40 साल की उम्र में इस दुनिया से चले जाना मराठों के लिए ही नहीं, देश की बाकी पीढ़ियों के लिए भी दर्दनाक भविष्य लेकर आया। अगले 200 साल गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहा भारत और कोई भी ऐसा योद्धा नहीं हुआ, जो पूरे देश को एक सूत्र में बांध पाता।

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