जाट नायक ठाकुर चूड़ामन सिंह

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जाट नायकों में ठाकुर चूड़ामन सिंह काफी अहम् स्थान रखते हैं. ये महाराजा सूरजमल के दादा के बड़े भाई थे. सूरजमल के पिता ठाकुर बदन सिंह का लालन-पालन इन्होने ही किया था. लेकिन आगे चलकर बदन सिंह ने इनके खिलाफ विद्रोह कर दिया और जय सिंह कछवाहा की मदद से खुद को जाटों का राजा घोषित कर दिया। सुरजमल का युग चूड़ामन सिंह के बाद शुरू होता है।

औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के युद्ध में चूड़ामन विजेता के साथ था। यह युद्ध 13 जून, 1707 को गर्मियों में आगरा के दक्षिण में जाजौ में हुआ। आज़म हार गया; उसे और उसके पुत्र को प्राणों से हाथ धोना पड़ा। मुअज़्ज़्म ‘शाह आलम प्रथम’ के रूप में राजगद्दी पर बैठा।
आज़म और मुअज़्ज़्म की सेनाओं की जाजौ में मुठभेड़ हुई, चूड़ामन अपने सैनिकों के साथ युद्ध का रूख़ देखता रहा और आक्रमण के लिए मौक़े की तलाश करता रहा। पहले उसने मुअज़्ज़्म के शिविर को लूटा। जब उसने देखा कि आज़म हारने लगा है तो मौक़े का फ़ायदा उठाकर वह भी उस पर टूट पड़ा। इस लूट के फलस्वरूप चूड़ामन बहुत धनी बन गया। मुग़लों की नक़दी, सोना, अमूल्य, रत्नजटित आभूषण, शस्त्रास्त्र, घोड़े, हाथी और रसद उसके हाथ लगे। इस धन के कारण वह जीवन-भर आर्थिक चिन्ताओं के बिलकुल मुक्त रहा।

चूड़ामन बहुत ही पहुँचा हुआ अवसरवादी था; सम्राट बहादुरशाह की मृत्यु के बाद उत्तराधिकार के लिए युद्ध तो होना ही था। जहाँदारशाह ने अपने तीन भाईयों को मार डाला और स्वयं राजसिंहासन पर बैठ गया। मौक़ा मिलते ही चूड़ामन राज-दरबार को छोड़कर अपने लोगों और अपनी जागीर की देखभाल करने के लिए आ गया। जब फ़र्रूख़सियर जहाँदारशाह को चुनौती देने के लिए दिल्ली आ पहुँचा, तब जहाँदारशाह ने सिनसिनवारों से सहायता माँगी। इस समय तक चूड़ामन यमुना के पश्चिमी तट पर रहने वाले जाटों तथा अन्य हिन्दू लोगों का वास्तविक शासक बन चुका था। जहाँदारशाह के अनुरोध पर चूड़ामन अपने अनुयायियों की एक बड़ी सेना लेकर आगरा तक बढ़ गया। राज-सिंहासन के दावेदारों में 10 जनवरी, 1913 को युद्ध हुआ। चूड़ामन ने आनन-फ़ानन में, दोनों पक्षों को बारी-बारी से लूटकर दोनों का ही बोझ हल्का कर दिया और उसके बाद वह थून लौट गया।इस युद्ध में जहांदार शाह मारा गया और फर्रूखशियर ने खुद को राजा घोषित कर दिया।

चूड़ामन का एक सम्बन्धी निःसन्तान मर गया था। वह एक धनी व्यापारी था। उसके भाई-बन्धवों ने चूड़ामन के बड़े पुत्र मोखमसिंह को बुलवाया, उसे दिवंगत सम्बन्धी की सारी ज़मींदारी का उसे प्रधान बना दिया और उसकी सब चीज़ें उसे सौंप दीं।चूड़ामन के द्वितीय पुत्र जुलकरणसिंह ने जब इस समपत्ति में अपना हिस्सा माँगा तो मोखमसिंह लड़ने-मरने को तैयार हो गया। जुलकरण भी झगड़ने पर उतारू था, उसने अपने आदमी इकट्ठे किए और अपने भाई पर हमला कर दिया। बड़े-बूढ़ों ने चूड़ामन को ख़बर भेजी कि उसके बेटे आपस में लड़ रहे हैं। चूड़ामन ने मोखम सिंह को समझाना चाहा, तो उसने गाली-गलौज शुरू कर दी और प्रकट कर दिया कि वह अपने भाई के साथ-साथ बाप से भी लड़ने के तैयार है। इस पर चूड़ामन आपे से बाहर हो गया और झल्लाकार उसने वह विष खा लिया, जिसें वह सदा अपने पास रखता था और फिर वह घोड़े पर चढ़कर एक वीरान बाग़ में पहुँचकर एक पेड़ के नीचे लेट गया और मर गया।

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