एक पणिहारी ने बचा ली मारवाड़ की लाज

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साल था 1544. जगह थी मारवाड़ का छोटा सा गांव गिरी-सुमेल. बंगाल और फिर मालवा जीतने के बाद शेरशाह ने मारवाड़ की तरफ रुख किया. अपनी सल्तनत को टिकाए रखने के लिए उसका मारवाड़ पर कब्जा जरूरी था. 1543 के साल में उसने मारवाड़ की तरफ कूच किया.1460 में मारवाड़ के शासक राव जोधा ने ‘चिड़िया टूंक’ की पहाड़ी पर महरानगढ़ का किला बनवाया और किले के अगल-बगल नया शहर बसाया – जोधपुर. इससे पहले मारवाड़ की राजधानी मंडोर हुआ करती थी. मंडोर के साथ दिक्कत ये थी कि ये किला समतल जमीन पर था. पहाड़ी किले सुरक्षा के लिहाज से काफी बेहतर होते हैं. शेरशाह ने जोधपुर को जीतने के लिए नई तरकीब अपनाई. शेरशाह ने अपने नाम से एक खत लिखा. इस खत में उसने मालदेव के कुछ सरदारों को वफ़ादारी बदलने के लिए शुक्रिया अदा किया था. शेरशाह ने ये खत मालदेव के डेरे के पास फिंकवा दिया ताकि ये उसके हाथ लग जाए. शेरशाह की चाल कामयाब रही. मालदेव भितरघात की अफवाह से परेशान हो गया. अब उसे जोधपुर खोने का डर सताने लगा और उन्होंने जोधपुर की तरफ कूच करने का फैसला कर लिया.

कहते हैं कि युद्ध क्षेत्र से पीछे हटने के फैसले के बाद मालदेव के दो सेनापति जेता और कुम्पा पास ही के कुएं से पानी पीने गए. इस समय वहां पर दो महिलाएं भी पानी लेने आई हुई थीं. इसमें से एक महिला ने चिंता जताते हुए दूसरी से कहा कि अफगान सैनिक बहुत खूंखार हैं. अगर वो आ गए तो हमारा क्या होगा? जवाब में दूसरी महिला ने कहा कि जब तक जेता और कुम्पा मौजूद हैं तब तक डरने की कोई बात नहीं.जेता और कुम्पा मारवाड़ के आसोप ठिकाने के सरदार थे. कुम्पा रिश्ते में जेता का चाचा लगता था. दोनों लोग मालदेव की सेना में सेनापति थे. महिला की बात सुनने के बाद जेता और कुम्पा मालदेव के डेरे में गए. उन्होंने मालदेव से कहा कि वो गिरी-सुमेल छोड़कर नहीं जाना चाहते. समझाइश के बाद मालदेव दस हजार घुड़सवारों की सेना को जेता और कुम्पा के नेतृत्व में पीछे छोड़कर जोधपुर चले गए.4 जनवरी 1544 के रोज मालदेव के जोधपुर चले जाने के बाद कुम्पा और जेता ने शेरशाह की सेना पर हमला कर दिया. शेरशाह को उम्मीद थी कि उसकी 80,000 की घुड़सवार सेना कुछ ही घंटों में 10,000 राजपूतों को पीटकर रख देगी. लेकिन कुछ भी वैसा नहीं हुआ, जैसा शेरशाह ने सोचा था. कुम्पा और जेता के नेतृत्व में राजपूतों ने मुकाबले की शक्ल बदल कर रख दी. कुछ ही घंटों में बादशाह की आधी सेना खेत रही.हालत यहां तक पहुंच गई कि शेरशाह ने मैदान छोड़ने की तैयारी कर ली. उसने वापिस दिल्ली लौटने के लिए अपने घोड़े पर जीन कसने के निर्देश भी दे दिए. इस बीच उसके सेनापति खवास खान ने आकर खबर दी कि कुम्पा और जेता मारे गए हैं और उसकी सेना ने भयंकर नुकसान झेलकर आखिरकार ये जंग जीत ली है. तब जाकर कहीं शेरशाह ने राहत की सांस ली.

तारीख-ए-दाउदी में जिक्र मिलता है कि जेता और कुम्पा की बहादुरी के बारे में सुनकर शेरशाह ने खवास से कहा, “मैं मुट्ठीभर बाजरे के लिए दिल्ली की सल्तनत गवां देता.”इस युद्ध में कुम्पा और जेता के मरने के बाद शेरशाह मारवाड़ के एक बड़े हिस्से पर कब्जा करने में कामयाम रहा. अजमेर से लेकर आबू तक का हिस्सा दिल्ली सल्तनत का भाग बन गया.

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