असीरगढ़ का किला:इस किले में आज भी भटकती है अश्वत्थामा की आत्मा

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मध्य प्रदेश राज्य की पहाडियों में स्थित का रहस्य आज कोई नहीं सुलझा पाया . असीरगढ़ के किले के संदर्भ में लोक मान्यता है कि इस किले के गुप्तेश्वर महादेव मंदिर में अश्वत्थामा अमावस्या व पूर्णिमा तिथियों पर शिव की उपासना और पूजा करते हैं। माना जाता है कि अश्वत्थामा पिछले 5000 साल से यहाँ रोज अमावस की रात शिव जी की पूजा करने आते हैं।. कहा जाता है कि असीरगढ़ के अलावा मध्यप्रदेश के ही जबलपुर शहर के गौरीघाट (नर्मदा नदी) के किनारे भी अश्वत्थामा भटकते रहते हैं। स्थानीय निवासियों के अनुसार कभी-कभी वे अपने मस्तक के घाव से बहते खून को रोकने के लिए हल्दी और तेल की मांग भी करते हैं। कई लोगों ने इस बारे में अपनी आपबीती भी सुनाई।किसी ने बताया कि उनके दादा ने उन्हें कई बार वहां अश्वत्थामा को देखने का किस्सा सुनाया है।

तो किसी ने कहा- जब वे मछली पकडऩे वहां के तालाब में गए थे, तो अंधेरे में उन्हें किसी ने तेजी से धक्का दिया था। शायद धक्का देने वाले को उनका वहां आना पसंद नहीं आया। गांव के कई बुजुर्गों की मानें तो जो एक बार अश्वत्थामा को देख लेता है, उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। यह मंदिर बहुत पुराना है। यहां तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है। मंदिर तक पहुंचने के लिए पैदल चढ़ाई करनी होती है। किंतु यहां पर पहुंचने पर विशेष आध्यात्मिक अनुभव होता है। मंदिर चारों ओर खाई व सुरंगो से घिरा है। माना जाता है इस खाई में बने गुप्त रास्ते से ही अश्वत्थामा मंदिर में आते-जाते हैं। इसके सबूत के रूप में मंदिर में सुबह गुलाब के फूल और कुंकुम दिखाई देते हैं।

माना जाता है कि अश्वत्थामा मंदिर के पास ही स्थित इस तालाब में स्नान करते हैं। उसके बाद शिव की आराधना करते हैं। इस मंदिर को लेकर लोक जीवन में एक भय भी फैला है कि अगर कोई अश्वत्थामा को देख लेता है तो उसकी मानसिक स्थिति बिगड़ जाती है। किंतु मंदिर के शिवलिंग के लिए धार्मिक आस्था है कि शिव के दर्शन से हर शिव भक्त लंबी उम्र पाने के साथ सेहतमंद रहता है।

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