जब हरम की दो रखैलों के कारण जहाँगीर ने बाप अकबर के खिलाफ बगावत कर दी

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ये तो सब जानते हैं कि शहजादा सलीम यानि जहाँगीर ने अपने बाप अकबर के खिलाफ कई बार बगावत का परचम लहराया था. लेकिन आपको ये जानकार हैरानी होगी कि सलीम ने सल्तनत के लिए नहीं बल्कि अकबर की हरम की दो रखैलों के कारण इस विद्रोह को अंजाम दिया .बहुत से लोग मानते हैं की सलीम का ये विद्रोह अनारकली के लिए था लेकिन बात कुछ और ही है .

अकबर के हरम में नादिरा बेगम या शरफ-उन्नीसा नाम की एक पर्शियन रखैल थी .अकबर इसे अनारकली के नाम से पुकारता था .अनारकली काफी खूबसूरत थी और अकबर उसे पसंद करता था. एक दिन जब अकबर अपने हरम की ओर जा रहा था तो उसने जहाँगीर को वहां से निकलते देखा और साथ ही उसकी नज़र अनारकली पर पड़ी जो मुस्कुरा कर सलीम को इशारे कर रही थी. अकबर को माजरा समझते देर नहीं लगी .अकबर इस घटना से इतना नाराज हुआ कि उसने अनारकली को कैद कर दीवार में चुनवाने का हुक्म दे डाला .सलीम अपने सामने अनारकली का ये हश्र देखता रहा लेकिन कुछ नहीं कर पाया .जब वो बादशाह बना तो उसने अनारकली का एक शानदार मकबरा लाहौर में बनवा कर अपनी इस पहली मुहब्बत को याद किया .अनारकली का हश्र देखने के बावजूद सलीम दूसरी बार अकबर के ही हरम की एक खूबसूरत बला मेहर उन्नीसा से मुहब्बत कर बैठा .अकबर ये नहीं चाहता था की उसकी रखैल जहाँगीर की बीबी बने इसलिए उसने मेहर की शादी अपने ही एक सरदार से करवा दी.

मुहब्बत में दूसरी बार चोट खाया सलीम इस शादी से तिलमिला उठा और उसने 1599 ई. में अकबर के खिलाफ विद्रोह कर दिया. सलीम अकबर की आज्ञा के बिना अजमेर से इलाहाबाद चला गया। यहाँ पर उसने स्वतन्त्र शासक की तरह व्यवहार करना शुरू किया। 1602 ई. में अकबर ने सलीम को समझाने का प्रयत्न किया। उसने सलीम को समझाने के लिए दक्षिण से अबुल फज़ल को बुलवाया। रास्ते में जहाँगीर के निर्देश पर ओरछा के बुन्देला सरदार वीरसिंहदेव ने अबुल फ़ज़ल की हत्या कर दी। निःसंदेह जहाँगीर का यह कार्य अकबर के लिए असहनीय था, फिर भी अकबर ने सलीम के आगरा वापस लौटकर (1603 ई.) में माफ़ी मांग लेने पर माफ़ कर दिया। अकबर ने उसे मेवाड़ जीतने के लिए भेजा, पर वह मेवाड़ न जाकर पुनः इलाहाबाद पहुँच गया। कुछ दिन तक सुरा और सुन्दरी में डूबे रहने के बाद अपनी दादी की मुत्यु पर सलीम 1604 ई. में वापस आगरा गया। जहाँ अकबर ने उसे एक बार फिर माफ़ कर दिया। इसके बाद सलीम ने विद्रोहात्मक रूख नहीं अपनाया।

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