जानिए ! दुर्गादास राठौड़ ने महाराजा जसवंत सिंह को दिया वचन कैसे पूरा किया

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इतिहास में वीर दुर्गादास राठौड़ को उसकी निडरता , बहादुरी और स्वामिभक्ति के लिए जाना जाता है । वीर दुर्गादास राठौड़ ने अपने पराक्रम और बुद्धिमानी से मुगल शासक औरंगजेब को लोहे के चने चबवा दिए थे।वीर दुर्गादास राठौड़ बचपन से ही साहसी था। एक बार जब जोधपुर सेना के कुछ ऊंट उनके खेतों में घुस गए और फसल को बर्बाद कर दिया तब वीर दुर्गादास ने चरवाहों से उन्हें खेतो से दूर ले जानी की शिकायत की लेकिन उन्होंने उसे अनसुना कर दिया ऐसे में वीर दुर्गादास गुस्से में आगबबूला हो गए और एक ही बार में ऊंट की गर्दन काट दी। उन्हें दरबार में लाया गया और उन्होंने निडर होकर अपना अपराध कबूला । उनकी निडरता देख ही महाराजा जसवंत सिंह ने उन्हें सेना में भर्ती किया।

महाराज जसवंत सिंह मुगल सेना के प्रधान सेनापति थे और उस समय मुगल सिंहासन पर औरंगज़ेब आया तो काबुल में विद्रोह हुए जिन्हें रोकने के लिए महाराजा जसवंत सिंह गए और युद्ध करते हुए मारे गए । औरंगज़ेब की कपटी नज़र पहले से ही जोधपुर के राज पर थी । औरंगज़ेब ने महाराजा जसवंत सिंह के इकलौते पुत्र पृथ्वी सिंह को साजिश करके मरवा डाला। तब वीर दुर्गादास राठौड़ ने अपने देश पर आए संकट को पहचाना और दूसरी रानी के नाबालिग पुत्र अजीत सिंह को बचाने और सिंहासन पर बैठाने का वचन उठाया।इसी बीच औरगज़ेब ने जोधपुर पर कब्ज़ा कर लिया लेकिन वीर दुर्गादास राठौड़ अपनी चतुराई से राजकुमार को सुरक्षित मेवाड़ पहुंचाने में सफल हुए।फिर उसने औरंगज़ेब के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया । उसने जयपुर, जोधपुर , उदयपुर के राजपूतों को एक किया और छापामार युद्ध करते हुए जोधपुर पर वापस भगवा लहराया ।इसी बीच २५ साल तक राजकुमार अजीत सिंह की देख रेख़ कर उसे औरंगज़ेब के षड्यंत्रों से बचाया । औरंगज़ेब ने उन्हें सभी तरह के लालच दिए लेकिन वीर दुर्गादास राठौड़ ने सारे लालच ठुकरा दिएऔर महाराजा अजीत सिंह को सिंहासन पर बैठा कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की ।

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