History Top 3 :भारतीय इतिहास के ये तीन महान योद्धा जो अपने ही लोगों से हार गए

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दोस्तों ! आज से हम आपके लिए लाये हैं history top 3 नाम की एक ख़ास सीरिज जिसमें 3 बड़े ऐतिहासिक घटनाओं को आपके सामने पेश करेंगे.इस सीरिज की पहली कड़ी में हम बात करते हैं भारतीय इतिहास के तीन ऐसे योद्धाओं की जिन्होंने अपने बाहुबल और बुद्धिमत्ता से काफी जीतें हासिल की लेकिन आपको ये सोच कर हैरानी होगी कि ये योद्धा आख़िरी समय में अपने अपनों का ही शिकार हो गए .किसी की धोखे से मौत हुई तो कोई अपने परिवार की जिद्द के आगे ज़िन्दगी की जंग हार गया .

3 अप्रैल 1680 को शिवाजी महाराज की मौत हो गई .इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज की मौत को लेकर कई तरह के संशय बरक़रार है, कईयों ने महाराज की दूसरी पत्नी सोयराबाई पर शिवाजी महाराज को जहर देने का शक जताया है .इस मान्यता को तब और बल मिला जब शिवाजी की मौत के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई में सोयराबाई के भाई हम्मीर्राव मोहिते ने संभा जी का साथ दिया .इतिहासकारों का कहना है कि शिवाजी महाराज को धीमा जहर दिया जा रहा था जिसकी वजह से वो उदर रोग से पीड़ित थे .दरअसल सोयराबाई अपने शम्भा जी की जगह अपने पुत्र राजाराम को राजा बनाना चाहती थी. उनकी यही चाहत छत्रपति शिवाजी महाराज की मौत का कारण बनी .

पेशवा बाजीराव बल्लाल भट्ट भारतीय इतिहास का एक अद्भुत योद्धा था. अलग-अलग युद्धों में 41बार दुश्मनों को शिकस्त देने वाले खुद अपने ही घर में हार गए .वजह थी मस्तानी .बाजीराव ने मस्तानी को अपनी दूसरी पत्नी का दर्जा दिया। मस्तानी मुसलमान थी। यहां तक कि उन्होंने बाजीराव और मस्तानी के विवाह को भी मानने से इन्कार कर दिया. हिन्दुओं ने मस्तानी के पुत्र को पूर्ण रूप से ब्राह्मण मानने से इन्कार कर दिया.यहाँ तक कि खुद बाजीराव के परिवार वाले मस्तानी से नफरत करते थे .मस्तानी के प्रति परिवार वालों का व्यवहार देख बाजीराव काफी दुखी रहते थे.बाजीराव जब युद्ध के लिए गए तो उनके परिवार वालों ने मस्तानी को कैद कर लिया . 28 अप्रैल, 1740 ई. को बाजीराव प्रथम की तबियत अधिक ख़राब होने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। बाजीराव के देहान्त के कुछ दिनों बाद मस्तानी की भी मौत हो गई। बाजीराव प्रथम की मौत की खबर सुनते ही मस्तानी ने अपनी अंगूठी में रखा ज़हर पीकर आत्महत्या कर ली। वहीं कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि मस्तानी सती संस्कार की प्रथा अपनाते हुए बाजीराव की चिता पर सती हो गईं। इतिहास की चालीस लड़ाइयों में दुश्मनों को हराने वाले बाजीराव अपने ही परिवार के कारण जिन्दगी की जंग हार गए .

मेवाड के राजा महाराणा कुंभा का नाम इतिहास में वीरता और अद्भूत योद्धा के रूप में प्रसिद्द है। कुम्भा का आतंक ऐसा था कि आस-पड़ोस के राजा उनसे दूर रहने में ही अपनी भलाई समझते थे. मेवाड़ के आसपास जो राज्य थे, उन पर उन्होंने अपना आधिपत्य स्थापित किया। 35 वर्ष की अल्पायु में उनके द्वारा बनवाए गए बत्तीस दुर्गों में चित्तौड़गढ़, कुंभलगढ़, अचलगढ़ जहां सशक्त स्थापत्य में शीर्षस्थ हैं, उनकी विजयों का गुणगान करता विश्वविख्यात विजय स्तंभ भारत की अमूल्य धरोहर है। कुंभा का इतिहास केवल युद्धों में विजय तक सीमित नहीं थी बल्कि उनकी शक्ति और संगठन क्षमता के साथ-साथ उनकी रचनात्मकता भी आश्चर्यजनक थी। ‘संगीत राज’ उनकी महान रचना है जिसे साहित्य का कीर्ति स्तंभ माना जाता है। जो राणा कभी भी युद्ध में दुश्मनों से नहीं हारे वो अपने बेटे के हाथों मात खा गए . इन्हें इनके बेटे ने ही धोखे से मौत के घाट उतार दिया था।

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